सफ़रनामा….

बेख़ौफ़ निकल पड़ा हूँ आज इस लंबी सड़क पर
नंगे पाँव चल दिया हूँ एक अनजाने से सफर पर

न उम्मीद है दिल से कोई, न चाह किसी मंज़िल की
न सितारों की तमन्ना, न आरज़ू कुछ और पाने की

चाँद-सितारे सब, महफ़ूज़ हैं अपनी-अपनी जगह
ये सफ़र ही मंज़िल है, ये मान कर चल दिया हूँ

अंधेरों से दोस्ती की तो जाना
सन्नाटों की भी एक आवाज़ है
वादियों से बात की तो जाना
कई किस्से उन्हें भी याद है

देखा है इन सब ने ख़ामोश होकर,
कई शहरों का बसना और उजड़ना
कहीं हँसती गलियों का पल में शांत हो जाना,
कहीं शोर से भरी बाजारों का वीरानों में बदलना

सालों से इन यादों को
अपने भीतर समेटे हुए हैं ये रास्ते
फिर भी नये शहरों, नये किस्सों के लिए
बाहें फैलाये हुए हैं ये रास्ते

कुछ यादें है मेरे साथ भी,
जो तन्हा नहीं छोड़ेंगी मुझे
कुछ आँसू आज भी हैं गालों को भिगोते
कुछ हँसी आज भी इन कानों में है गूँजती

उन यादों का बोझ लेकर
चल पड़ा हूँ इस राह पर
उन चेहरों को पीछे छोड़कर
चला आया हूँ कहीं दूर मगर

साथ हमेशा रहेंगी, कुछ खट्टी-मीठी यादें

चल पड़ा हूँ पीछे छोड़कर, उनसे जुड़ी ख्वाहिशें
कुछ अनकहे क़िस्से, कुछ अधूरी उम्मीदें

– सौनक पाल

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