एक हसीं शाम, दो ख़ामोश ज़ुबान….

एक हसीं शाम, दो ख़ामोश ज़ुबान
छत पर गिरती कुछ बारिश के बूंदें
नदी किनारे की वो छोटी
चाय की दुकान

कई सालों बाद आज फिर यहाँ आ गये हैं दोनो
आज फिर यहाँ शोर सिर्फ बूंदों का है
उबलती हुए चाय से आती हुई महक
आज फिर पुराना वक़्त साथ ला रही है

वही बेचैन नज़रें वही हल्की मुस्कान
वही बढ़ी हुई धड़कनें दिल में उठते फिर कई सवाल

बीच में हैं दो काँच के गिलास
और उनसे उभरता, हल्का-सा धुआं
ख़ामोशी में ठहरा हुआ वक़्त
और झुकी पलकों से होतीं कहानियाँ बयान

इसी जगह कभी पहले मिला करते थे वो
चाय से होती थी बातें शुरू
चुस्कियों के बहाने मिला करती थीं नज़रें
दबी मुस्कुराहट से हुई थी ये दोस्ती शुरू

आज भी कुछ वैसी ही शाम है
आज भी हैं बीच में दो चाय के गिलास
आज भी नज़रों से हो रही हैं बातें
आज भी उनके मिलने से ठहरा है वक़्त

                                      -सौनक पाल

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