आज़ाद हूँ क्या मैं..?

देखता हूँ चरों और जब मैं
कई रंग नज़र आते हैं
रंगों मैं ढले हुए
अलग अलग लोग नज़र आते है

आवाज़ें है कई आज भी
भीड़ से उठती इस शोर मैं
हर आवाज मैं छुपी हुई
अलग भाषा सुनाई देती है

इन रंगों में, भाषाओँ मैं
अपना रंग, अपनी अलग आवाज ढूंढता हूँ
इन एहसासों के ज़रिये ही
खुदको तुझसे अलग पहचानता हूँ

तेरी पहनावे से मैं तेरी, सीरत को परखता हूँ
एक मुस्कान से मैं तेरी, नीयत को तोलता हूँ

तू आती है मेरे शहर में
बदनाम तुझे करने का हख बनता है
तेरे नए लिबास, नए विचार आज भी
मेरे शहर को गन्दा करता है

आज़ाद हूँ क्या मैं, रंगों में लिपटी इन बंदिशों से?
आज़ाद हूँ क्या मैं जाती और रिवाजों से?

सूरज की किरणें खिड़की से आकार
जब मुझको हर सुबह जगाती है
कौनसा वो रंग है जो
उन किरणों को मुझतक लाती है?

हवा के झोंके जब
फूलों की खुशबु मुझतक लाती है
कौनसी वो बोली है जो
उसको मेरे घर का पता बताती है?

आज़ाद है वह सूरज, रंगों के पहचानों से
आज़ाद है ये हवाएँ, भाषाओँ के आवाजों से

आज इतने साल हुए मुझे
आज़ाद कहलाते हुए
फिरभी इन सवालों से
शायद अब भी मैं आज़ाद नहीं

बंधा हूँ आज भी मैं
अपने विचारों के बंदिशों से
कैद हूँ आज भी मैं
रंगों और भाषाओँ के जंज़ीरों से

                                            -सौनक पाल

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In Search of the Distant Light

On the open road he ran
Towards a distant light
Leaving behind the days of youth
To achieve all that he might

Was advised
‘work hard, when you are young
To rejoice the days to come
To earn all the riches of the future
Buckle up, there’s no time for FUN’

Days went by and so did years
But still on the road he ran
Many cities went past and so did friends
He seldom stopped to turn

To the dazzling light he had to reach
Which still stayed far away
In search of the luminous unknown
Many candles flickered away

Now the dreams have long faded
and so has the yearning to achieve

Tired and broken he still runs
Coz now
That’s the only way he can
                                                       

                                                                        Saunak Pal